गलत गिरफ्तारी और जेल वापसी

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सी.आर.पी.सी) की धारा 57 और अनुच्छेद 22(2) के तहत वारंट के बिना गिरफ्तार किसी भी व्यक्ति को उचित अवधि से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, जो किसी भी घटना में 24 घंटे से अधिक नहीं होगा। इस 24 घंटे की अवधि की समाप्ति के भीतर, गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की आवश्यकता होती है धारा 167 के तेहत, सीआर. पी. सी.। आगे धारा 97 के तेहत,मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह गलत तरीके से हिरासत में लिए गए व्यक्तियों की खोज करने के लिए एक सर्च वारंट जारी करे।

सर्वोच्च न्यायालय ने सी.बी.आई बनाम aनुपम जे. कुलकर्णी 1992 एस.सी.आर (3) 158 [भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 2 जज बेंच] मुद्दे का निपटारा किया, कि क्या जिस व्यक्ति को निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया गया है धारा 167[1] के तेहत, उसे 15 दिनों की प्रारंभिक अवधि की समाप्ति के बाद भी पुलिस हिरासत में वापस भेजा जा सकता है जिसका न्यायालय ने ना में जवाब दिया। इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि कानून किसी पुलिस अधिकारी को किसी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय के लिए हिरासत में रखने के लिए अधिकृत नहीं करता है तथा इस समय में गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट अदालत तक की यात्रा के लिए आवश्यक समय शामिल नहीं है। धारा 167 (1) पूरी प्रक्रिया कवर करती है और यह भी बताती है कि आरोपी को निकटतम मजिस्ट्रेट के पास भेजते समय पुलिस अधिकारी को मामले से संबंधित डायरी में प्रविष्टियों की एक प्रतिलिपि भी भेजनी चाहिए। डायरी में की गयी प्रविष्टियाँ मजिस्ट्रेट को आवश्यक जानकारी देने के लिए होती हैं, जिस पर वह निर्णय ले सकता है कि आरोपी को हिरासत में रखा जाना चाहिए या नहीं। मुख्य रूप से, उन्होंने यह माना है कि यदि कोई आवेदन किया जाता है और यदि वह संतुष्ट है कि उसे हिरासत में भेजने के लिए कोई आधार नहीं है तब इस स्तर पर भी मजिस्ट्रेट आरोपी को जमानत पर रिहा कर सकता है। लेकिन अगर वह संतुष्ट है कि जेल में वापस भेजना आवश्यक है तो कार्यवाई करनी चाहिए धारा 167 के तेहत.

यदि गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा जाए तो क्या होता है, इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने मनोज़ बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1999) 3 एस सी सी 715 (भारत के उच्चतम न्यायालय, 2 न्यायाधीश पीठ)में विचार किया. न्यायलय ने कहा कि केवल दो ही परिस्थितियां हैं जिनमें 24 घंटे के भीतर उत्पादन के संवैधानिक जनादेश को टाला जा सकता है यानी जब गिरफ्तार किया गया व्यक्ति "विदेशी शत्रु" हो या जब गिरफ्तारी निवारक नजरबंदी के लिए किसी कानून के तहत हो। अन्य सभी मामलों में संविधान ने पूर्णत: निषिद्ध कर दिया है कि "मजिस्ट्रेट के अधिकार के बिना ऐसे किसी व्यक्ति को उक्त अवधि से अधिक के लिए हिरासत में नहीं लिया जाएगा"।

कोलकाता उच्च न्यायालय [कलकत्ता उच्च न्यायालय, खंड न्यायपीठ] ने मो हनीफ मोंडल सी.आर.एम 7502/2018 में; 13.09.2018 को मनोज के मामले का हवाला देते हुए निर्णय लिया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए बिना ऐसे गैरकानूनी बंदी का तात्कालिक परिणाम यह है कि आरोपी को को जमानत पर छोड़ना पड़ता है, अगर पूरी तरह से छुट्टी नहीं दी जाती है।

अवैध निरोध पर जेल वापसी का परिणाम

ऊपर बताए अवैध हिरासत पर कानून के बावजूद, यह निर्धारित किया जाता है कि एक बार एक अभियुक्त को धारा 167 के तहत एक वैध आदेश द्वारा जेल वापस भेज दिया गया है, फिर सीआर.पी.सी की धारा 57 के तहत अवैधता का तथ्य और अनुच्छेद 22(2) रिहाई या जमानत का आधार नहीं है।

इन साध्वी प्रज्ञा सिंघ ठाकुर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2011) 10 एस.सी.सी 445 में सर्वोच्च न्यायालय [भारत के सर्वोच्च न्यायालय, 2 जजों की बेंच], ने कहा कि "भले ही तर्क के लिए यह मान लिया जाए कि अपीलकर्ता को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर पेश नहीं करने पर पुलिस द्वारा किसी भी तरह का उल्लंघन हुआ था, अपीलकर्ता अपनी स्वतंत्रता तभी हासिल कर सकती है जब तक वह पुलिस की हिरासत में थी और उसके बाद उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, और मजिस्ट्रेट को यह सूचना थी कि उसे हिरासत में भेज दिया गया है। पुलिस द्वारा सी.आर.पी.सी की अनुच्छेद 22(2) या धारा 167[2] के तहत गैर-अनुपालन किए जाने पर भी अपीलकर्ता द्वारा अपनी स्वतंत्रता स्थापित करने की कोशिश नहीं की जा सकती।”

इन सप्तवन बनाम असम राज्य में ए.आई.आर 1971 एस.सी 813 में सर्वोच्च न्यायालय [भारत के सर्वोच्च न्यायालय, 3 न्यायाधीशों की पीठ], ने माना कि बाद में कानूनन हिरासत को पहले गैरकानूनी नजरबंदी से नहीं हटाया गया है।

इसी प्रकार, मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने आप को पेश करने और बाद में वापस जेल भेजने के बाद अवैध रूप से हिरासत में लिए गए एक आरोपी की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट की मांग करने की छूट नहीं है, जब तक कि रिमांड का आदेश खुद अधिकार क्षेत्र के बिना या पूरी तरह से यांत्रिक तरीके से पारित न हो या पूरी तरह से अवैध हो (मनुभाई रतिलाल पटेल बनाम गुजरात राज्य (2013) 1 एससीसीसी 314 [भारत का सर्वोच्च न्यायालय, 2 न्यायाधीश पीठ]; उदय मोहनलाल आचार्य बनाम महाराष्ट्र राज्य(2001) 5 एस सी सी सी 453 (सर्वोच्च न्यायालय, 3 न्यायाधीश पीठ)

हालाँकि, गलत गिरफ्तारी/अवैध हिरासत पर मुआवजे के लिए न्यायालय में अपील करने की व्यवस्था पहले से ही है। भीम सिंघ बनाम जम्मु कश्मीर और इतर राज्य (1985) 4 एस.सी.सी 677 में सर्वोच्च न्यायालय [भारत का सर्वोच्च न्यायालय, 2 जजों की बेंच] ने पुलिस द्वारा याचिकाकर्ता को गलत तरीके से हिरासत में रखने के मुआवजे के रूप में रु.50,000 देने को कहा। जब कोई व्यक्ति दिखाता है कि उसे गिरफ्तार किया गया है और शरारती या दुर्भावनापूर्ण इरादे से कैद किया गया है तथा उसके संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों का हनन किया गया है, तो न्यायालय के पास उपयुक्त मौद्रिक पुरस्कार देकर पीड़ित को नुकसान की भरपाई का मुआवजा देने का अधिकार है।

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