मोटर वाहन दुर्घटना: मुआवज़ा

गरीबी और सड़क दुर्घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं, और भारत में सड़क दुर्घटनाओं के महत्वपूर्ण प्रतिशत में मोटर वाहन और पैदल यात्री/साइकिल चालक शामिल हैं। मोटर वाहन के मामलों में गरीबों के सबसे अधिक प्रभावित होने की संभावना है और एक दुर्घटना अक्सर उनके परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ा कर तथा उनकी कमाई की क्षमता पर अंकुश लगाकर उन्हें गरीबी की ओर ढकेलती है।

आमतौर पर पीड़ित या उनके परिवार मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों के सामने कई साल बिताते हैं ताकि उन्हें उन दुर्घटनाओं का मुआवजा मिले जो उन्होंने झेला है। मुआवजे की अवहेलना में देरी अक्सर निवारण के उद्देश्य को विफल कर देती है।

2009 से, दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे आर मिढा के उदाहरण पर और बाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित, मोटर दुर्घटना दावों के स्थगन की योजना में विभिन्न सुधार पेश किए गए हैं।

संशोधित प्रक्रिया, जो अब लागू है, उसने मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून में क्रांति ला दी है और दावेदारों को दावा याचिका दायर किए बिना दुर्घटना के 120 दिनों के भीतर मुआवजा मिल सकता है।